(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

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॥ श्रीः ॥
11.6. अध्यायः 006
Mahabharata - Strii Parva - Chapter Topics
पूर्वाध्याये कान्तारादित्वेन रूपितानां संसारादीनां स्वस्वशब्दैः प्रतिपादनम्॥ 1 ॥


Mahabharata - Strii Parva - Chapter Text

धृतराष्ट्र उवाच। 11-6-0x(5322)(64929)
अहो खलु महद्दुःखं कृच्छ्रवासं वसत्यसौ।
कथं तस्य रतिस्तत्र तुष्टिर्वा वदतां वर॥ 11-6-1(64930)
स देशः क्वनु यत्रासौ वसते धर्मसङ्कटे।
कथं वा स विमुच्येत नरस्तस्मान्महाभयात्॥ 11-6-2(64931)
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व साधु चेष्टामहे तदा।
कृपा मे महती जाता तस्याभ्युद्धरणेन हि॥ 11-6-3(64932)
विदुर उवाच। 11-6-4x(5323)
उपाख्यानमिदं राजन्मोक्षविद्भिरुदाहृतम्।
सुगतिं विन्दते येन परलोकेषु मानवः॥ 11-6-4(64933)
उच्यते यत्तु कान्तारं महासंसार एव सः।
वनं दुर्गं हि यच्चैतत्संसारगहनं हि तत्॥ 11-6-5(64934)
ये च ते कथिता व्याला व्याधयस्ते प्रकीर्तिताः॥ 11-6-6(64935)
या सा नारी बृहत्काया अध्यतिष्ठत तत्र वै।
तामाहुस्तु जरां प्राज्ञा रूपवर्णविनाशिनीम्॥ 11-6-7(64936)
स यस्तु कूपो नृपते स तु देहः शरीरिणाम्।
यस्तत्र वसतेऽधस्तान्महाहिः काल एव सः।
अन्तकः सर्वभूतानां देहिनां प्राणाहार्यसौ॥ 11-6-8(64937)
कूपमध्ये च या जाता वल्ली यत्र स मानवः।
प्रोतो ययाऽभवल्लग्नो जीविताशा शरीरिणाम्॥ 11-6-9(64938)
स यस्तु कूपपीनाहे तं वृक्षं परिसर्पति।
षड्वक्त्रः कुञ्जरो राजन्स तु संवत्सरः स्मृतः॥ 11-6-10(64939)
मुखानि ऋतवो मासाः पादा द्वादशा कीर्तिताः।
ये तु वृंक्षं निकृन्तन्ति मूषिकाः पन्नगास्तथा॥ 11-6-11(64940)
रात्र्यहानि तु तान्याहुर्भूतानां परिचिन्तकाः।
ये ते मधुकरास्तत्र कामास्ते परिकीर्तिताः॥ 11-6-12(64941)
यास्तु ता बहुशो धाराः स्रवन्ति मधुनिस्रवम्।
तांस्तु कामरसान्विन्द्याद्यत्र सज्जन्ति मानवाः॥ 11-6-13(64942)
एवं संसारचक्रस्य परिवृत्तिं विदुर्बुधाः।
येन संसारचक्रस्य पाशांश्छिन्दन्ति सर्वथा॥ ॥ 11-6-14(64943)

इति श्रीमन्महाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि पञ्चमोऽध्यायः॥ 5 ॥

Mahabharata - Strii Parva - Chapter Footnotes
11-6-4 उपमानमिदं राजन्निति झ.पाठः॥ 11-6-6 षष्ठोऽध्यायः॥


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